दूर दूर तक नदिया गहरी
ताल तलैया छलके पानी
मछली कहती करुण कहानी
जल में मोती मानिक पाले
सो सो साज सिंगर सम्हाले
कब तक चौखट दरवाजे पर
सुख दुःख सहती पड़ी रहोगी
कब तक अग्नि परीक्षा डौगी
बलिवेदी पर चढ़ी रहोगी
अब तो चुप चुप वार सहो मत
बाहर आओ जल की रानी
ताल तलैया छलके पानी
मछली कहती करुण कहानी
बाहर आने का डर कैसा
जल के घर में भी तो डर है
जल की सीमाओं को तोड़ो
बाहर देखो मार्ग प्रखर है
तुम्हे नहीं भय लगता है क्या
जल के भीतर घड़ियालो से
दरी सहमती क्यों रहती हो
बाहर लहराते ब्यालो से
अपनी सीमाए पहचानो
रोने की छोडो नादानी
ताल तलैया छलके पानी
मछली कहती करुण कहानी
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