Saturday, October 5, 2013

सुरभि खोजते भाग रहे हम मृग कस्तूरी के।

सुरभि खोजते भाग रहे हम मृग कस्तूरी के।

क्या मिल जाये किसे सहेजे,
कितनी अभिलाषा।
निर्मल जल में डूब रहा,
मन नख - शिख तक प्यासा।

सूखा कंठ सुलगती चितवन कुछ तो कहती है,
हम अपने में सिमट गए, अपनी ही दूरी से।

वन पांखी तुम नभ में
उड़ते गीत सुनाते हो।
पुरइन के पत्तो पर,
घर संसार सजाते हो।

रंग बिरंगे सजा कुमकुमे, अपने पंखो में,
नांचे मुखर मयूर, विहसते नयन मयूरी के।          

सुरभि खोजते भाग रहे हम मृग कस्तूरी के।

पिता कौन सा घर है मेरा।

पिता कौन सा घर है मेरा

किस घर की सांकल खटकाऊ,
किस चौखट पर शीश झुकाऊ।
कहाँ सुरक्षित रह पाउंगी,
कहाँ न दुत्कारी जाउंगी।  
बड़ी दुधारी राह बन गयी, कितने ही प्रश्नों ने घेरा।
पिता कौन सा घर है मेरा।

यहाँ पराया धन कहलायी,
वहां पराये घर की बेटी।
कहीं न पैर टिके धरती पर,
कहने में होती है ठेठी।
मन बीहड़ में भटक रहा है, जैसे बंजारे का डेरा।
पिता कौन सा घर है मेरा।

तुमने कन्या दान कर दिया,
पुण्य किया दानी कहलाये।
तुम तो माँ भाभी सबको भी,
दान पुण्य में ही ले आये।  
अब तो न्याय करो बेटी संग, मिटे धुंधलका मिटे अँधेरा।
पिता कौन सा घर है मेरा।

दान दहेज़ नहीं बस कुछ भी,
स्वाभिमान की आस जगी है।
न्याय समय से हो न सकेगा,
कुछ करने की प्यास जगी है।
अपनी राह स्वयं चलने को, आज बढ़ रहा है पग मेरा।
पिता कौन सा घर है मेरा।

मै अपराजिता


मै अपराजिता
मिट्टी में पानी में, सब में अलंकृता।

हर पल संजोया है
दुखते हुए मन में।
प्रीति कण बोया है,
फिर  भी हर क्षण में।

धरती सा धीरज,
इसे तोड़ नहीं पाओगे।
मोह कहो माया कहो
छोड़ नहीं पाओगे।

प्रकृति ने हर पल लिखा है मेरा पता।
मै अपराजिता।

फूलों से सुरभित,
कांटो से घेरी हुयी।
आदि से अंत तक,
मेरी ही फेरी हुयी।

सारा संसार मेरी,
पग ध्वनि पर नाचा है।
गीता रामायण सबने,
मुझे ही तो बांचा है।

सूरज की किरण मै, चांदनी सी सुष्मिता।
मै अपराजिता।

Sunday, June 27, 2010

उडती जाना सोन चिरैया

पिंजरे बैठी सोन चिरैया
चमचम चूनर चोली पहने
कंगन झूमर जगमग गहने
खिल खिल हस्ती सोन चिरैया
पिंजरे बैठी सोन चिरैया

नयी नयी पिंजरे में आई
मन में सौ सौ सपने लायी
छुई मुई सी कोमल पलके
पुतली में जुगनू से चमके
गुन गुन गाती सोन चिरैया
पिंजरे बैठी सोन चिरैया

पिंजरे का दरवाजा भारी
अन्दर रहने की लाचारी
पलकों के सपने मुरझाये
हर पल पीहर की सुधि लाये
गुमसुम रहती सोन चिरैया
पिंजरे बैठी सोन चिरैया

आंगन का सूनापन टूटा
नन्हे शिशु का रोदन फूटा
भूली पीहर भाई बहना
उसने पाया नया खिलौना
लोरी गाती सोन चिरैया
पिंजरे बैठी सोन चिरैया

पिंजरा तो पिंजरा होता है
चाहे सोने से मंडवा लो
पिजरे के तारो को चाहे
मोती मानिक से जड़वा लो
टुक टुक तकती सोन चिरैया
पिंजरे बैठी सोन चिरैया

बाहर बहती मधुर हवाए
उड़ने को प्रतिपल उकसाए
सोन चिरैया बाहर आओ
बार बार कोई कह जाये
पंख खोलती सोन चिरैया
पिंजरे बैठी सोन चिरैया

पिंजरे का दरवाजा खोला
जुड़े हुए पंखो को तौला
नील गगन से इन्द्रधनुष तक
धरती का कान कान यह बोला
अब न लौटना सोन चिरैया
उडती जाना सोन चिरैया
उडती जाना सोन चिरैया

लौट कर आ पाएंगे क्या फिर सुनहरे दिन

लौट कर आ पाएंगे
क्या फिर सुनहरे दिन

रेत को भी थपथपा
जब घर बनायेंगे
धूप अक्षत फूल से
उसको सजायेंगे

और फिर मकरंद की ले रेशमी डोरी
बांध लेंगे गुनगुनाती रागनी की धुन

लौट कर आ पाएंगे
क्या फिर सुनहरे दिन

प्रात की स्वर्णिम किरण
आह्लाद लाएगी
धूप खिलते फूल सी
मन को लुभाएगी

साँझ फिर ठहरे हुए संवाद को लेकर 
कान में लोरी सुनाये बिन रुके पल छिन

लौट कर आ पाएंगे
क्या फिर सुनहरे दिन

और फिर भी हम नहीं रोये

और फिर भी हम नहीं रोये

दे चुके संत्रास बादल
लौट अपने घर गए
इन्द्रधनुषी रंग लेकर
कुछ गगन से कह गए

प्रलय पावक दाह बिजली
द्वार तक आये सभी
किन्तु हमने आँख के
मोती नहीं खोये

और फिर भी हम नहीं रोये

हम न थे पत्थर समय
साक्षी रहा हर मोड़ पर
टूटकर बिखरे नहीं बस
बात अपनी छोड़कर

कौन अपना बन सके
इस बात को लेकर
आज तक हमने किसी के
पग नहीं धोये

और फिर भी हम नहीं रोये

टूटता है स्वप्न दर्शी मन

टूटता है स्वप्न दर्शी मन

दूर तक आक्रोश का सागर
विश्बुझी हर लहर चलती है
नाव पर पतवार पथराई
पार जाने को तरसती है

दृष्टि को लगता किनारा मिल गया
किन्तु बढती दूरियां प्रतिक्षण
टूटता है स्वप्न दर्शी मन

क्षितिज तक है हवन की बेदी
हो रही आहुति नमन आचरण की
त्याग तप पर धूल की परते
होड़ है निर्लज्जता के वरन की

आरती के बोल घुटने टेकते
किस विकृति के पूजने होंगे चरण
टूटता है स्वप्न दर्शी मन