Saturday, June 19, 2010

और मौसम मुह छिपाता चल दिया

हम धरा से गगन तक जुड़ते रहे
और मौसम मुह छिपाता चल दिया

दे गयी संत्रास बर्फीली हवाएं
चुभ रहा है चांदनी का रूप भी
लग रहा औसा की लुक छिप कर कहीं
छल रही है गुनगुनाती धुप भी

सृष्टि की रचना सरलतम आदमी
इसे जीने के लिए क्यों छल दिया

हम धरा से गगन तक जुड़ते रहे
और मौसम मुह छिपाता चल दिया

स्वर्ण अपने में स्वयं पहचान है
आग में ताप कर सदा ही निखरता
आदमी भी समय सागर में यहाँ
बूंद बन कर झिलमिलाता बिखरता

मोम सा जल कर पिघलने के लिए
जिंदगी को भाग्य का संबल दिया
हम धरा से गगन तक जुड़ते रहे
और मौसम मुह छिपता चल दिया

कायरो के हाथ में शमशीर भी सजती नहीं है

यातना से यंत्रणा से जूझता अब देश
बंशी चैन की बजती कहीं है

उमड़ आया है यहाँ
सैलाब सडको पर
बंद कमरों में उधर
संगीत चलता है

अनिश्चय की आग में
जलती युवा पीढ़ी
तपने को हाथ अब
आदेश मिलता है

अब करो आह्वान फिर नटराज का
कथा भस्मासुर, अधिक चलती नहीं है

अस्मिता से देश की
उपहास रोको
दांव पर हर एक घर की
लाज रोको
जाती भाषा प्रान्त
सब रूठे पड़े हैं
द्वेष के शर राह
पर तिरछे अड़े हैं

भूल कर सत्ता पिपासा मौन बैठो
कायरो के हाथ में शमशीर भी सजती नहीं है

यदि जीवन में प्यार न होता

नेह डोर से बंधे न होते
तो जीवन क्या जीवन होता

कैसे राग मल्हार समझते
कैसे गाते सुखद प्रभाती
कैसे सपनो के सागर में
जीवन की नैया लहराती

सुख दुःख सब सुने रह जाते
यदि जीवन में प्यार न होता

नेह डोर से बंधे न होते
तो जीवन क्या जीवन होता

विरहा की भीगी तानो में
मुखर न होती मन की भाषा
और प्रतीक्षारत चातक भी 
क्यों गाता मन की अभिलाषा

विरह मिलन की निर्झरनी में
जीने का आधार न होता
नेह डोर से बंधे न होते
तो जीवन क्या जीवन होता

धरती के स्नेहिल रिश्तो को
मोहजाल का नाम न देना
यह बंधन इतिहास बनाते 
सजता घर का कोना कोना

मरघट सा सूनापन होता
यह सुन्दर संसार न होता
नेह डोर से बंधे न होते
तो जीवन क्या जीवन होता



दीपक मांग रहा उजियारा

दीपक मांग रहा उजियारा

बाती झिलमिल रत अँधेरी
नेह बूंद को भटके मांझी
कैसे कहे अँधेरे से वह
ज्योति राशी कब किसने बांटी

अंधियारे ने राह न रोकी
दीपशिखा बस जलती आई
यही ज्योति का दान दिए को
अपना बनकर छलती आई

आज उजाले के द्वारे पर दीपक ने है हाथ पसारा
दीपक मांग रहा उजियारा

सत्ता सुख की महिमा ऐसी
बचन बद्धता धुल हो गयी
जिसको गरिमा मिली लगा बस
यही समय की भूल हो गयी

क्या सोने वालो को आगे
बढ़कर स्वयं जगाना होगा
पवन पुत्र को शक्ति और
क्षमताये फिर समझाना होगा

उठो! नेह से दीपक भर दो जले दिया मेरे अन्गियारा
दीपक मांग रहा उजियारा

Thursday, June 10, 2010

क्षीर नीर का ज्ञानी हंसा

सपनो में खोया जग सारा
जागे कौन जगाये कौन

मै मेरा सुख ने तो सारी
सीमाओं को तोडा है
और समय ऐसा निर्मोही
कहीं न कुछ भी छोड़ा है

भौतिक सुख की एक धुरी पर
सबका जीवन घूम रहा
ऐसे में चुप रहना अच्छा
किसे कहाँ समझाए कौन

यही देश है क्या जिसको
सोने की चिड़िया कहते थे
चौथेपन में राजा भी
सन्यासी बन कर रहते थे

छोटा जीवन आशाओं की
बेल दूर तक फ़ैल रही
यह संकेत नहीं शुभ फिर भी
अच्छा बुरा बताये कौन

महाभोज की पंगत में
कौवों गिद्धों की दावत है
क्षीर नीर का ज्ञानी हंसा
होता प्रतिपल आहत है

यही विसंगति देश और मिट्टी
से नाता तोड़ रही
मरुथल के प्यासे हिरना को
जल प्रवाह दिखलाये कौन


सपनो में खोया जग सारा 
जागे कौन जगाये कौन

छालो की सौगात

पाती में लिखकर भेजी क्यों
तुमने जग की करुण कहानी
एक तुम्हारा हस्ताक्षर ही
दर्पण सा सब कुछ कह देता

ओस भरी पंखुरियों पर जब,
पहली किरण विहंसती आई
भीगी पलकों के सपनो में
सुरभि कोष की हुयी विदाई

यही एक क्षण अनजाने ही
युग युग की गाथा कह देता

एक तुम्हारा हस्ताक्षर ही 
दर्पण सा सब कुछ कह देता

धुआं धुआं बदल बिजली से
जल जाने की बात न कहते
अंगारों पे चलने वाले
छालो की सौगात न सहते

समय बिखरते तिनको से भी
सुन्दर नीड़ सृजित कर देता
एक तुम्हारा हस्ताक्षर ही 
दर्पण सा सब कुछ कह देता

कृपन बुद्धि को लिखकर भेजी
बात कौन समझा पायेगा
इनका उसर बंजर मन क्या
हरियाली को सह पायेगा

यह तो बस इतना समझेंगे
कौन इन्हें है कितना देता
एक तुम्हारा हस्ताक्षर ही 
दर्पण सा सब कुछ कह देता

मुट्ठियों में व्यथा

चलो फिर गगन को धरा पर उतारें

सृजन है अधुरा अधूरी कथा है
जनम से बंधी मुट्ठियों में व्यथा है
नयन सीपियों ने छिपाए हैं मोती
बिखरने न पायें बड़ी बात होगी

कि फिर प्राण वीणा पे स्वर को संवारें
चलो फिर गगन को धरा पर उतारें

कहाँ खो गए स्वर कहाँ राग खोये
उनीदे नयन ने न सपने संजोये
खुले द्वार कोई नयी राह निकले
दिशाओं में फैली तमस टूट बिखरे

कि फिर नीड़ में पंछियों को पुकारें
चलो फिर गगन को धरा पर उतारें