Monday, June 7, 2010

सम्बन्ध सपने हो गए

प्रेरणा के स्नेह के सम्बन्ध सपने हो गए

थाम कर अंगुली बढ़ाये
पग कभी जिसने
हो गया सक्षम गले
तक हाथ उसका आ गया

फूल के मकरंद में
कैसी कलुषता भर गयी
तितलियों के होठ पर
छूते पसीना आ गया

बांसुरी के मधुर स्वर की चह में
वेणुवन में हम उलझ कर राह गए
प्रेरणा के स्नेह के सम्बन्ध सपने हो गए

शांत गहरी झील में
पत्थर न फेको इस तरह
सैकड़ो घेरे सवालो के
खड़े हो जायेंगे

मनुजता का क्षरण आँखे बंद हैं
जाग कर भी यो लगा सब सो गए
प्रेरणा के स्नेह के सम्बन्ध सपने हो गए

बोल मेरी मछली कितना पानी

बोल मेरी मछली कितना पानी

लहर लहर के साथ बहे तू
जाल से मोह न छूते तेरा
कूल किनारे छलते जाये
बना बना कर जाल का घेरा

खेल खेल में थाह बता दे चुप रहना तो है नादानी
बोल मेरी मछली कितना पानी

आगे पीछे जल ही जल है
थाह न नापो बढ़ते जाओ
लहरों पर भी बस तुम अपनी
यश की गाथा गढ़ते जाओ
गले गले तक जब आ जाये तब मत पूछो कितना पानी
बोल मेरी मछली कितना पानी

यह तो जल है सीपी घोंघे
शंख सभी का आश्रयदाता
पर सीधे जल में भी बिच्छू
सीधी राह नहीं चल पाता
गहरे पैठो तब समझोगे जल की महिमामयी कहानी
बोल मेरी मछली कितना पानी

Saturday, June 5, 2010

समय को तो बीतना है

समय का क्या समय को तो बीतना है

सुखद से दो पल
हवा में उड़ न जाये
और फिर दुःख
दाह में हम घिर न जाये

इस लिए हम
नित नए विधान रचते
भागते पल को
पकड़ने को ललकते

पर समय तो वीतरागी है चिरंतन
इसे तो हर एक क्षण में रीतना है
समय का क्या समय को तो बीतना है

बीतता हर पल यहाँ
इतिहास बनता
रत दिन का खेल
बनता है बिगड़ता

यह रुके तो यहीं
जन जीवन रुकेगा
कौन आशावान हो कर
जी सकेगा

बुलबुले हम हो भले ही समय सागर के
पर हमे तो भंवर में भी जूझना है जितना है
समय का क्या समय को तो बीतना है

कहाँ से भटक आये कौन डगर भूले

जंगल वन उपवन विहंसते अमलतास 
घर में आँगन में नागफनी फूले


बंद पंखुरियो में सपने सजाये हुए 
मौन अलसाई सी सुरभि में समाये हुए 
प्रेम भरी पाती सा तुमने लुभाया है
जैतूनी अंगराज तुम में समाया है


कैसे वैरागी से अलग थलग दूर खड़े
कहाँ से भटक आये कौन डगर भूले  

जंगल वन उपवन विहंसते अमलतास 
घर में आँगन में नागफनी फूले

अपने इन शरबती फूलो से अमलतास
आँगन में फैली नागफनी से ढँक दो 
इनके कंटीले पथरीले अहं पर 
अपनी सुकोमल सी पंखुरियां रख दो 

हरियाले अंचल को लहराती पवन वधू 
हंस हंस हर पेगो पर गगन छोर छू ले 
जंगल वन उपवन विहंसते अमलतास 
घर में आँगन में नागफनी फूले

 

बेगाने भी मीत

आंसू बन कर स्वप्न बहे कुछ
कुछ आकुल हो गीत हो गए

मन सरसिज की पंखुरियो पर
सुख दुःख अब तक ठहर न पाए
कितना पंकिल रहे सरोवर
लहरों ने भी जाल बिछाए

पर जीवन की लय गति मिलकर
जाने कब संगीत बन गए

आंसू बन कर स्वप्न बहे कुछ
कुछ आकुल हो गीत हो गए 

अपना तरकश तीर लिए सब
आर पार की बात कर रहे
मीठी मधुमिश्रित वाणी से 
अपने बन कर नित्य छल रहे 

इसी अनोखी दुरभिसंधि में
बेगाने भी मीत बन गए 
आंसू बन कर स्वप्न बहे कुछ
कुछ आकुल हो गीत हो गए 

दे रही चहु और फेरे

धार पर शमशीर के अब तक चली हूँ
इसलिए अब पैर में चुभता न कोई शूल मेरे

यह युगों से जूझती जलती कथा है
भूमिजा से चल रही दारुण व्यथा है 
वह वनों में भटकती असहाय सीता
रख सकी जो मान पति का थी पुनीता

उस पवित्रा ने न फिर से देह धरी
इसलिए उस सी न जन्मी और नारी
और द्वापर में सती का रूप बदला
द्रोपदी का चीर हरने को यहाँ पुरुषत्व मचला

इस घिनौने कर्म पर रखी पुरुष ने मौन वाणी
आग सी मचली कि सोते से जगे जैसे भवानी
जाग कर तबसे बराबर दे रही चहु और  फेरे

धार पर शमशीर के अब तक चली हूँ
इसलिए अब पैर में चुभता न कोई शूल मेरे 

मौन रह कर अनुगमन अब तक किया है 
भूल थी बस हलाहल को मधु समझ कर पी लिया है
पी लिया विष जल उठी हैं कामनाये
चौंक कर जागी झुलसती सुलगती सी भावनाए

अब सुनहले स्वप्न दे चलना कठिन है
घुन्घरुओ की खनक ले चलना कठिन है
बढ़ चुका है मान हमसे देश घर परिवार सबका 
सर उठा कर हम खड़े हैं छोड़ कर अब मोह घर का 

देवियों की भांति पुजने के लिए आये नहीं हम 
दानवी कह कर न सर पर अब चढाओ धुल मेरे 
धार पर शमशीर के अब तक चली हूँ
इसलिए अब पैर में चुभता न कोई शूल मेरे 


पीढियों से अनकही

क्यों प्रभंजन बन गयी शीतल हवाएं
त्रासदी कुछ तो भयंकर ही रही होगी

चूड़ियाँ कुमकुम महावर से सजाकर
पायलों की बेड़ियाँ अब तक पिन्हाई
हर समय एक खुबसूरत भूल ले कर
हर प्रगति के पथ की सीमा बनायीं

बुद्धि बल से हीन अपने ही घरो में
पल रही थी जो घरेलू दासियों सी
सर उठाया है उन्ही ने बात करने को
बात वह जो पीढियों से अनकही होगी


क्यों प्रभंजन बन गयी शीतल हवाएं 
त्रासदी कुछ तो भयंकर ही रही होगी

बंद घर में बुद्धि हो या शक्ति दोनों छीजती हैं
आग मन की विवश हो कर आंसुओ में भीगती है 
अब समय बदला कि चौखट द्वार सबका मोह छूटा
कुछ करें आगे बढे यह प्रण किया सबने अनूठा 

इस अनूठी कामना के दीप लेकर चल रही हैं 
बेटियां अपने वतन की नाम रौशन कर रही हैं
रौशनी दो अब अँधेरे का पड़े साया न इन पर 
ये सही हक़दार सदियों से रही होंगी 

क्यों प्रभंजन बन गयी शीतल हवाएं 
त्रासदी कुछ तो भयंकर ही रही होगी