Saturday, May 22, 2010

मन बंजारा

मन बंजारा
गली गली दर दर भटकाए
नील गगन में पर फैलाये
कुतिया में भी रहने पर यह
शीश महल के स्वप्न दिखाए

बड़ा हठीला
अंगुली पकडे
रोज घुमाता यह जग सारा
मन बंजारा

सागर इसका मोती इसके
लहरों के स्पंदन इसके
नाच नचाये यह मनमाना
नूपुर इसके रुनझुन इसके

खुली आँख में
स्वप्न सजाता
फिर भी लगता सबको प्यारा
मन बंजारा

सुख से भागे दुःख से भागे
याचक सा हर घर में झांके
कभी धरा पर कभी गगन पर
इसकी गति कोई क्या नापे

इसका कहीं
न ठौर ठिकाना
स्वयं विधाता इससे हरा
मन बंजारा 

Friday, May 21, 2010

रख दी तेग दुधारी होगी

तेरे आँगन में छिपकर जब
मेरा प्रणय निवेदन रोया
तुने सुनी अनसुनी कर दी
कोई तो लाचारी होगी.

यही नहीं मेरी पीड़ा को
पवन उड़ाकर जब ले आयी
तेरे द्वार झरोखों ने भी
गुपचुप दी थी मुझे विदाई.

रातें हीर दिवस रांझे थे
फिर भी समझ न पाए अब तक
तेरे कोमल मन पर किसने
रख दी तेग दुधारी होगी

वर्षा बीती खिले गगन पर
तारे नीचे जुगनू चमचम
शेफाली की महक बावली
नाच रही है उपवन उपवन

कमल पत्र पर गिरती बूंदे
ठहर न पाती परभर लेकिन
तूने किसका मन रखने को
बनती बात बिगड़ी होगी.

स्वयंसिद्धा हूँ

माँ मुझे तू जन्म दे तेरे लहू का अंश हू मैं.

मारना आसन है मुझको बहुत मै जानती हूँ.
हूँ बहुत निरुपाय बंधन में बंधी यह मानती हूँ.
बोझ हूँ तेरे लिए क्या तू इसे सच कह सकेगी?
जीव हत्या कर भला क्या तू सुखी हो रह सकेगी.

कोख के इस पालने में घुट रही हूँ मै निरंतर,
और तू भी सिसकियो से रो रही है.
पेट में अपराधियों सा रख मुझे तू
क्यों भला मातृत्व सुख भी खो रही है.

माँ! घिनौनी साजिशो में तू न आना
फूलता फलता तेरा ही वंश हूँ मै.

बंद मेरी मुट्ठियों में भाग्य भी है कर्म भी.
मै स्वयं ही शक्ति हूँ मुझमे सृजन का धर्म भी
माँ सशंकित रह न तू बस मार्ग का विस्तार कर दे
आ रही हूँ मै अधर्मी का यहाँ निस्तार करने.

माँ! ह्रदय से तू लगा कर कह मुझे संतान अपनी
बन सकूँ तेरा सहारा बन सकूँ पहचान अपनी
स्वयंसिद्धा हूँ मुझे तू मार कर अपराध मत कर 
दो कुलों का यश बढाती हूँ सदा यह ध्यान तो कर.

भय न कर अब द्वार स्वागत का सजा ले
हर दरिन्दे के लिए विष दंश हूँ मै

माँ मुझे तू जन्म दे तेरे लहू का अंश हू मैं.

गगन छोर छूने दो

नदिया हूँ, बहने दो,
धूप छांव सहने दो.

लहरों से किनारों से,
मचलते मझदारो से,
जल की जलाशय की
बात कुछ कहने दो.


नदिया हूँ, बहने दो,
धूप छांव सहने दो.


रुकने का अर्थ नहीं,
बहना भी व्यर्थ नहीं,
जीवन का घात प्रतिघात,
सब सहने दो.


नदिया हूँ, बहने दो,
धूप छांव सहने दो.

कल कल ध्वनि की किलोल,
नाचे अब जग हिलोर,
मन की विहन्गनी को,
गगन छोर छूने दो.

नदिया हूँ, बहने दो,
धूप छांव सहने दो.

शक्ति पूजन

बेटियां शीतल हवाएं ही नहीं हैं
शक्ति हैं ये शक्ति का पूजन करो अब.

ये धरा सी सहनशीला,
गगन सा विस्तार इनमे.
विगत आहत को सम्हाले
वर्तमान हुलास इनमे.

इन्हें बेचारी न कह वंदन करो अब,
शक्ति हैं ये शक्ति का पूजन करो अब.

दीप बेटा है अगर  तो
वहीँ बेटी वर्तिका है
वंश का गौरव दिए से
और बाती से सजा है.

ये समय को दे रही आवाज़
अभिनन्दन करो अब,
शक्ति हैं ये शक्ति का पूजन करो अब.

Thursday, May 20, 2010

हर लहर पर नाम लिख दे

खो न जाये हम समय की तेज धारा में
लेखनी तू हर लहर पर अब हमारा नाम लिख दे.

पुलिन तक फिर कौन जाये,
हम कभी जाएँ न जाएँ.
और जीवन के भंवर में
हैं बड़ी अनजान राहें .

जब समय की हाट पर घिरने लगें बादल धुएं के,
लेखनी तब हर डगर पर तू हमारा नाम लिख दे.


खो न जाये हम समय की तेज धारा में
लेखनी तू हर लहर पर अब हमारा नाम लिख दे.

धुल मिट्टी में बिहंसता,
खो गया बचपन हठीला.
कामना के पंख ले
उड़ता रहा जीवन सजीला.

रात अंधियारी घिरे जब, गगन पर बिखरे सितारे,
लेखनी तू हर सितारे पर हमारा नाम लिख दे.

खो न जाये हम समय की तेज धारा में
लेखनी तू हर लहर पर अब हमारा नाम लिख दे.

मृग कस्तूरी के

सुरभि खोजते भाग रहे हम,
मृग कस्तूरी के.

क्या मिल जाये, किसे सहेजें,
कितनी अभिलाषा.
निर्मल जल में डूब रहा मन,
नख शिख तक प्यासा.

सुखा कंठ सुलगती चितवन
कुछ तो कहती है
हम अपने में सिमट गए
अपनी ही दुरी से.


सुरभि खोजते भाग रहे हम,
मृग कस्तूरी के. 

वन पंखी तुम नभ में उड़ते 
गीत सुनाते हो.
पुरैन के पत्तो पर 
घर संसार सजाते हो.

रंग बिरंगे सजा कुमकुमे 
अपने पंखो में,
नाचे मन मयूर 
विहास्ते नयन मयूरी के.

सुरभि खोजते भाग रहे हम,
मृग कस्तूरी के.